गुरुवार, 20 मई 2010

आम आदमी

मैं
एक आम आदमी
रोज सवेरे
सपनों भरी नींद
का मोह त्यागकर
उठता हूँ ,
आईने में,
कल तक
चेहरे पर उभर आई
खरोंचों को
देखकर अनदेखा
करता हुआ
एक नए संघर्ष के लिए
खुद को तैयार
करता हूँ
और
ना जाने कितने ही
कदमों द्वारा
रौंदी गई
सडकों पर
भीड़ का हिस्सा बन
निकल पड़ता हूँ ,
मैं
एक
आम आदमी

8 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

आपका यह संघर्ष ही आपको सफलता की मंज़िल तक पहुंचाएगा।

nilesh mathur ने कहा…

वाह! कमाल की पंक्तियाँ है!

दिलीप ने कहा…

bahut khoob...

sangeeta swarup ने कहा…

सत्य को बताती सुन्दर अभिव्यक्ति

sangeeta swarup ने कहा…

आपकी ये रचना चर्चा मंच पर ली गयी है ...

http://charchamanch.blogspot.com/2010/05/163.html

रश्मि प्रभा... ने कहा…

ek aam aadmi ki yahi to niyti hai ..

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

आम आदमी का संघर्षमय जीवन का सत्य दर्शाती सुन्दर रचना !

स्वप्निल कुमार 'आतिश' ने कहा…

badhiya peshkash ...aam aadmi is sangarsh ko khaas ban ke bhi na bhule yahi kamna hai ...