मंगलवार, 3 अगस्त 2010

ग़ज़ल के चंद शेर

तमाम दर्द पैवस्त करके सीने में
है लुत्फ़ कुछ अलग इस तरह से जीने में

मुझे तलाश नहीं है मसर्रतों की अब
मज़ा सा आने लगा आंसुओं को पीने में

सिसक रहे हैं जो बच्चे उन्हें हंसा दो जरा
क्या ढूंढते हो भला काशी में मदीने
में


3 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सिसक रहे हैं जो बच्चे उन्हें हंसा दो जरा
क्या ढूंढते हो भला काशी में मदीने में

वाह ...बहुत सुन्दर

mai... ratnakar ने कहा…

kafee achchha laga hai, achchha laga. aakhiree sher bhopal ke shayar basheer badr ka ek sher yaad dilata hai
ghar se maszid hai bahut door
chalo aisa karen
kisee rote hue bachche
ko hansaya jaye

Readers Cafe ने कहा…

Last ki 2 lines ati uttam...wah lazawaab

- Tarun