शनिवार, 26 सितंबर 2009

फूल जहाँ कागज़ के बिकते ....


फूल जहाँ कागज़ के बिकते ये दुनिया है वो बाज़ार
मैं खुशबू का सौदागर हूँ चल ना सका मेरा व्यापार

हवा के संग संग चलते हैं जो उनको मिलती है मंज़िल
वो पायें मंजिल को कैसे हवा से है जिनकी टकरार

गीत जो लिखने बैठा उन पर खोल के खिड़की आँगन की
मन में थी फूलों की दुनिया और बाहर चाकू की धार

पेट की आग बुझाने को वो करतब क्या क्या दिखलाता
आग पे नंगे पाँव है चलता जुबां पे रखता है अंगार अवनीश उनियाल 'शाकिर'

मन का पंछी बहुत है भोला जाने ना क्या है जीवन
जमीं पे चल ना सके दो कदम ,गगन में ढूंढें है आधार