शनिवार, 24 अप्रैल 2010

बूँद

जिंदगी भर
एक वीरान मरुस्थल की
सूखी धरती को खोदकर
कोशिश करता रहा
पानी की एक
बूँद निकालने की
भूल गया कि
तपती दोपहरी के
इस उष्णकाल में
सिमट गई होगी
पानी की हर बूँद
अपने आप में

7 टिप्‍पणियां:

दिलीप ने कहा…

bahut khoobsoorat...

राकेश कौशिक ने कहा…

बहुत खूब - सच्चा और अच्छा अहसास

शशांक शुक्ला ने कहा…

बहुत सुंदर रचना है

Yugal Mehra ने कहा…

अच्छी शुरुआत, बधाई हो

अजय कुमार ने कहा…

हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

जयराम “विप्लव” { jayram"viplav" } ने कहा…

कली बेंच देगें चमन बेंच देगें,

धरा बेंच देगें गगन बेंच देगें,

कलम के पुजारी अगर सो गये तो

ये धन के पुजारी वतन बेंच देगें।

हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में राज-समाज और जन की आवाज "जनोक्ति "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . नीचे लिंक दिए गये हैं . http://www.janokti.com/ , साथ हीं जनोक्ति द्वारा संचालित एग्रीगेटर " ब्लॉग समाचार " http://janokti.feedcluster.com/ से भी अपने ब्लॉग को अवश्य जोड़ें .

sangeeta swarup ने कहा…

सटीक रचना.....

कृपया वर्ड वेरिफिकेशन हटा दें....टिप्पणी करने में आसानी रहे गी