सोमवार, 12 जुलाई 2010

ये जिंदगी है पहाड़ की ...........

आज कोई कविता या ग़ज़ल पोस्ट नहीं करूँगा , आज पेश है पहाड़ की समस्याओं भरी जिंदगी से रूबरू कराता एक वाकया ,जिसमें अगर पहाड़ का दर्द आपको दिखाई दे ,तो कृपया अपनी प्रतिक्रिया/टिप्पणी के माध्यम से मुझे अवश्य अवगत कराएँ , मैं मानूंगा कि मेरी यह कोशिश सार्थक हुई ,
हुआ यूँ कि मेरी पत्नी जिसे लगभग एक महीने का गर्भ था ,पिछले कुछ दिनों से निरंतर कमर दर्द की शिकायत कर रही थी ,मैंने कारण पूछा तो पता चला कि पानी से भरा बर्तन उठाने के दौरान लगे झटके के बाद से कमर दर्द आरम्भ हुआ है ,आपको बताता चलूँ कि हमारा गाँव और यह संपूर्ण क्षेत्र जो कि उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जनपद में स्थित है ,आजकल पानी की भयंकर किल्लत से जूझ रहा है ,लोग कई कई किलोमीटर दूर से पानी लाने को मजबूर हैं ,यह जिम्मेदारी विशेषकर औरतों की होती है ,घर के सभी कामों व् पालतू जानवरों की देख रेख के साथ साथ यह अतिरिक्त जिम्मेदारी उन पर बहुत भारी पड़ती है ,विगत वर्ष तो कभी कभार टैंकरों के माध्यम से पानी की व्यवस्था की जाती रही किन्तु इस वर्ष ग्राम प्रधान धन की कमी का रोना रोते हुए पानी की व्यवस्था कर पाने में असमर्थता जता रहा है , ऐसा लगता है कि अगर यही स्थिति रही तो गाँवों के बाशिंदे यहाँ से पलायन करने को मजबूर हो जायेंगे ,अक्सर सुनता हूँ कि पानी की पाइप लाइन बिछाने के लिए लाखों रुपये की योजना स्वीकृत हुई है ,किन्तु नतीजा सिफ़र ही रहता है , यदि कुछ जगह पाइप बिछे भी हैं तो उचित देख रेख के अभाव में लोगों तक जलापूर्ति नहीं हो पाती ,प्यासे हलक लिए लोग कब तक यहाँ रह सकेंगे ,यह विचार मुझे अक्सर झकझोर देता है ,क्या राजधानी देहरादून में बैठे मंत्रियों,नेताओं और नौकरशाहों तक इन निरीह ग्रामीणों की यह प्यास कभी पहुँच पाएगी?
खैर , पत्नी का कमर दर्द जब निरंतर बना रहा और साथ ही हल्का हल्का खून आने की शिकायत हुई तो मुझे एक योग्य चिकित्सक की आवश्यकता महसूस हुई किन्तु दूर दूर तक कोई योग्य चिकित्सक उपलब्ध न होने से मेरी चिंता बढ गई ,और मैंने डाकटरी परामर्श हेतु देहरादून आने का निश्चय किया ,किन्तु सुबह ९ बजे के पश्चात देहरादून के लिए कोई गाडी उपलब्ध ना होने के कारण हमें पूरा दिन और पूरी रात बेचैनी में काटनी पड़ी , अगली सुबह मैंने गाडी की एक सीट बुक करने के लिए ड्राईवर को फ़ोन करना चाहा तो नेटवर्क में खराबी की वजह से फ़ोन भी नहीं मिल पाया , फिर हमने थक हारकर सड़क पर ही खड़े रहने का निर्णय लिया ,इस उम्मीद पर कि शायद कोई ना कोई गाडी हमें मिल ही जायेगी ,लम्बे इन्तजार के बाद एक गाडी (टाटा सुमो ) हमारे सामने आ खड़ी हुई ,मैंने पत्नी की हालत को देखते हुए ड्राईवर से एक सीट बुक करने का आग्रह किया ,पत्नी को सीट पर लिटाकर स्वयं अपने चार वर्षीय बालक को गोद में ले उसी सीट के कोने पर दुबक कर बैठ गया ,शुरूआती १० किलोमीटर के सफ़र के दौरान दो और सवारियां गाडी में बैठी जिनमें एक बीमार बुढिया थी जो शायद इलाज के लिए देहरादून जा रही थी और दूसरा एक हट्टा कट्ठा किन्तु बुरी तरह चोटिल नौजवान था जिसके बदन के लगभग हर हिस्से पर चोट के निशाँ थे जिनमें से हल्का हल्का खून भी रिस रहा था ,पूछने पर पता चला कि एक बड़े बांज के पेड़ से लकडियाँ काटते समय पैर फिसलने से उसकी यह हालत हुई ,यह सब देखकर मन एक अजीब पीड़ा से भर गया ,धीरे धीरे कुछ दूरी और तय करते करते गाडी सवारियों से ठसाठस भर गई ,जब गाडी के भीतर जगह कम पड़ने लगी तो कुछ लोग गाडी की छत पर और एक सज्जन तो ड्राईवर के साथ ही उसी की सीट पर बैठ गए, परिणामस्वरूप गाडी के संचालन हेतु पर्याप्त जगह ना होने के कारण ड्राईवर बमुश्किल किसी तरह गाडी आगे बढाने लगा ,एक तो तंग पहाड़ी सडकों के सर्पीले मोड़ ,गहरी गहरी खाइयाँ और ऊपर से ड्राईवर के इस अंदाज़ से गाडी चलाने की वजह से मुझे किसी अनहोनी के होने का डर सताने लगा , आँखों के आगे अखबारों की वो सुर्खियाँ चमकने लगी जिनमें अक्सर पहाड़ी सड़कों पर गाडी के गिरने और लोगों के हताहत होने का जिक्र होता है,बार बार मोड़ आने और गाडी के लहराते हुए चलने से पत्नी और पुत्र दोनों को मितली की शिकायत होने लगी ,दोनों इधर उधर की खिडकियों से उल्टी करने लगे ,उनको सँभालते सँभालते मेरी भी तबियत कुछ बिगड़ गई ,मुझे डर हुआ की कहीं मैं भी ना मुंह खोल दूं ,उधर पीछे की सीट में भी एक महिला उल्टी कर कर के बेहाल हो चुकी थी,
खैर लगभग ४ घंटे के सफ़र के पश्चात गाडी देहरादून पंहुची ,मैंने ड्राईवर को सधन्यवाद किराया दिया और यथाशीघ्र एक सुप्रसिद्ध महिला डॉक्टर से काफी मिन्नत कर के उन्हें मामले की गंभीरता को समझाकर मिलने का समय माँगा ,किन्तु तब तक शायद समय बीत चुका था ultrasound करने पर पता चला कि गर्भस्राव हो गया है ,एक सपने पर तुषारापात हुआ , मन दुःख और ग्लानि में डूब गया,मैं और मेरी पत्नी इस घटना के संभावित कारण ढूँढने लगे ,कभी लगा कि शायद पानी का बर्तन उठाने से ऐसा हुआ तो कभी सही वक़्त पर चिकित्सा सुविधा का ना मिल पाना और कभी पहाड़ी सफ़र के दौरान गाडी में लगे झटकों और उल्टियों में हमें इसका कारण दिखने लगा ,
किन्तु कुछ भी हो इस संपूर्ण घटनाक्रम से जो दर्द और व्यथा मुझे मिली उससे यह एहसास मुझे अवश्य हुआ कि उत्तराखंड कि इन पहाड़ियों में ऐसी ना जाने कितनी ही दर्द भरी कहानियां रोज़ लिखी जा रही होंगी ,और इनके पात्र पहाड़ में पहाड़ जैसा जीवन जीने को अभिशप्त होंगे ,क्या हमारे मौकापरस्त ,सत्तालोलुप राजनेता इन कहानियों में अंतर्निहित पथरीली सच्चाइयों और वेदना को कभी समझ पाएंगे ?यह सवाल मुझे निरंतर परेशान कर रहा है
नोट -यह पोस्टिंग गूगल सॉफ्टवेर की मदद से कर रहा हूँ ,पूर्ण विराम लगाना आता नहीं सो अल्पविराम से ही काम चला लिया

1 टिप्पणी:

Udan Tashtari ने कहा…

पहाड़ी जीवन के दर्द को सही तरीके से उकेरा है...वरना तो पहाड़ी जीवन की रुमानियत के किस्से ही पढ़ने मिलते हैं और मन को ललचाते हैं. आभार इस पहलु से परिचित कराने का..