मंगलवार, 3 जनवरी 2012

एक लम्बे अरसे के बाद इस ब्लॉग को पुनर्जीवित करने की कोशिश करते हुए एक कविता प्रकाशित कर रहा हूँ ,कृपया अपनी प्रतिक्रियाएं अवश्य दें जिससे निरंतर लिखते रहने का उत्साह बना रहे ,कविता कुछ इस तरह है ....
कितने आकाश हैं
इस
आकाश के नीचे
और
कितने ही धरातल
इस
जमीन के ऊपर
जिनके मध्य
तैर रही हैं
साँसे
बदल रहे हैं रंग
ढल रहे दिन
जम रही रातें
और
उग रहे हैं कई सूरज ......

3 टिप्‍पणियां:

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

Nice poem .

हक़ीक़त को पाने के लिए गहरी नज़र, कड़ी साधना और निष्पक्ष विवेचन की ज़रूरत पड़ती
है।
और ज़्यादा तफ़सील जानने के लिए देखें-

http://vedquran.blogspot.com/2012/01/sufi-silsila-e-naqshbandiya.html
सूफ़ी
साधना से आध्यात्मिक उन्नति आसान है Sufi silsila e naqshbandiya

Shah Nawaz ने कहा…

इस बेहतरीन रचना के साथ फिर से ब्लॉग जगत में आने पर आपका स्वागत है!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

गहन भाव लिए अच्छी रचना