मैं
एक आम आदमी
रोज सवेरे
सपनों भरी नींद
का मोह त्यागकर
उठता हूँ ,
आईने में,
कल तक
चेहरे पर उभर आई
खरोंचों को
देखकर अनदेखा
करता हुआ
एक नए संघर्ष के लिए
खुद को तैयार
करता हूँ
और
ना जाने कितने ही
कदमों द्वारा
रौंदी गई
सडकों पर
भीड़ का हिस्सा बन
निकल पड़ता हूँ ,
मैं
एक
आम आदमी
गुरुवार, 20 मई 2010
रविवार, 16 मई 2010
सड़क पर ....
अक्सर
चलते हुए
सड़क पर
दिख जाती हैं मुझे
कई
लुटी हुई
जिंदगियां
वीरान आंखों
में कहीं
गहरे तक धंसी
निराशा ,हताशा
और
सूखी नसों में
खून
की जगह
दौड़ती मौत
दिख जाती है मुझे
अक्सर
चलते
हुए
सड़क पर
चलते हुए
सड़क पर
दिख जाती हैं मुझे
कई
लुटी हुई
जिंदगियां
वीरान आंखों
में कहीं
गहरे तक धंसी
निराशा ,हताशा
और
सूखी नसों में
खून
की जगह
दौड़ती मौत
दिख जाती है मुझे
अक्सर
चलते
हुए
सड़क पर
गुरुवार, 13 मई 2010
दो जून की रोटी
मासूम बचपन ने
बुना था जो एक
विशाल सपना
वो
जवानी तक आते आते
सिकुड़कर
इतना छोटा
हो गया कि अब
दायरे में उसके
आती हैं
सिर्फ
दो जून की रोटी
बुना था जो एक
विशाल सपना
वो
जवानी तक आते आते
सिकुड़कर
इतना छोटा
हो गया कि अब
दायरे में उसके
आती हैं
सिर्फ
दो जून की रोटी
बुधवार, 12 मई 2010
शब्दों के मुखौटे
मेरी मानो तो
रहो खबरदार
उन लोगों से
जो बाँध देते हैं तुमको
शब्दों की सुनहरी
बेड़ियों से
जो लहराते हुए
फेंकते हैं तुम पर,
शब्दों की मखमली चादर
और ढक देते हैं
तुम्हारी आँखों को
जो कभी सहलाते और कभी
गर्माते हैं तुम्हें
शब्दों से,
शब्दों का मुखौटा
पहने ये लोग
अपने शब्दों की हथेली
तुम्हारे पांवों के नीचे रख ,
उठाते हैं तुम्हें ऊंचा
और दिखाते हैं पल भर को
वो सतरंगी आसमान
जो कभी भी नहीं हो सकता
तुम्हारा !
मेरी मानो तो
रहो खबरदार
शब्दों की
बाजीगरी से
रहो खबरदार
उन लोगों से
जो बाँध देते हैं तुमको
शब्दों की सुनहरी
बेड़ियों से
जो लहराते हुए
फेंकते हैं तुम पर,
शब्दों की मखमली चादर
और ढक देते हैं
तुम्हारी आँखों को
जो कभी सहलाते और कभी
गर्माते हैं तुम्हें
शब्दों से,
शब्दों का मुखौटा
पहने ये लोग
अपने शब्दों की हथेली
तुम्हारे पांवों के नीचे रख ,
उठाते हैं तुम्हें ऊंचा
और दिखाते हैं पल भर को
वो सतरंगी आसमान
जो कभी भी नहीं हो सकता
तुम्हारा !
मेरी मानो तो
रहो खबरदार
शब्दों की
बाजीगरी से
शनिवार, 24 अप्रैल 2010
बूँद
जिंदगी भर
एक वीरान मरुस्थल की
सूखी धरती को खोदकर
कोशिश करता रहा
पानी की एक
बूँद निकालने की
भूल गया कि
तपती दोपहरी के
इस उष्णकाल में
सिमट गई होगी
पानी की हर बूँद
अपने आप में
एक वीरान मरुस्थल की
सूखी धरती को खोदकर
कोशिश करता रहा
पानी की एक
बूँद निकालने की
भूल गया कि
तपती दोपहरी के
इस उष्णकाल में
सिमट गई होगी
पानी की हर बूँद
अपने आप में
रविवार, 6 दिसंबर 2009
कूड़ा बीनती बच्ची
मैं कविता लिखूंगा
तुझ पर ओ बच्ची ,
कि तेरे मासूम हाथों में
खिलौनों कि जगह
कूड़े का थैला
आया आख़िर क्यों ?
कि शहर के घरों से निकली
इस गन्दगी के ढेर में
हाथों को फंसाए तू
ठीक उस वक्त पर
जब स्कूलों में
पहली घंटी बजती है,
क्या ढूंढ रही है ?
शायद वो रोटी
जो तेरे हिस्से में थी लेकिन
कई टुकड़ों में बंट कर
पक रही उन आलिशान घरों में
जिनमें कि तुझ जैसों का
अन्दर आना मना है
मैं कविता लिखूंगा
तुझ पर ओ बच्ची
मगर पूछ लूँ पहले
अपने उन खुदाओं से
जो लम्बी राह चलकर भी
अभी तुझ तक नहीं पहुंचे
कि तेरी मूक आंखों में जो
सवाल हैं गहरे
उनका जवाब पाने में
अभी कितना वक्त लगना है?
वादों के जंगल में अभी कितना
भटकना है ?
मैं कविता लिखूंगा
तुझ पर ओ बच्ची
मगर पहले आश्वश्त जरा हो लूँ
कि उसको पढने वालों में
होगी संवेदना बाकी
कि उनकी आँखें होंगी नम
कविता में जब तू रोएगी
मुझे डर है तेरे आंसू कहीं
बेकार ना जाएँ
कागज़ तक ही रहें दिलों में पहुँच ना पायें
मैं कविता लिखूंगा
तुझ पर ओ बच्ची
मगर पहले अपनी
उलझन ये सुलझा लूँ
कि तुझे देखकर
क्यों मैंने कलम ये उठाई?
पकड़ के तेरी कलाई
तुझे राह उजाले कि आख़िर
क्यों ना दिखाई?
शायद इसलिए
कि तेरी तरह ही मैं भी
फरेबों ,साजिशों के
अंधेरों में खड़ा हूँ
और रोशनाई में कलम की
रोशनी को
ढूंढ रहा हूँ
तुझ पर ओ बच्ची ,
कि तेरे मासूम हाथों में
खिलौनों कि जगह
कूड़े का थैला
आया आख़िर क्यों ?
कि शहर के घरों से निकली
इस गन्दगी के ढेर में
हाथों को फंसाए तू
ठीक उस वक्त पर
जब स्कूलों में
पहली घंटी बजती है,
क्या ढूंढ रही है ?
शायद वो रोटी
जो तेरे हिस्से में थी लेकिन
कई टुकड़ों में बंट कर
पक रही उन आलिशान घरों में
जिनमें कि तुझ जैसों का
अन्दर आना मना है
मैं कविता लिखूंगा
तुझ पर ओ बच्ची
मगर पूछ लूँ पहले
अपने उन खुदाओं से
जो लम्बी राह चलकर भी
अभी तुझ तक नहीं पहुंचे
कि तेरी मूक आंखों में जो
सवाल हैं गहरे
उनका जवाब पाने में
अभी कितना वक्त लगना है?
वादों के जंगल में अभी कितना
भटकना है ?
मैं कविता लिखूंगा
तुझ पर ओ बच्ची
मगर पहले आश्वश्त जरा हो लूँ
कि उसको पढने वालों में
होगी संवेदना बाकी
कि उनकी आँखें होंगी नम
कविता में जब तू रोएगी
मुझे डर है तेरे आंसू कहीं
बेकार ना जाएँ
कागज़ तक ही रहें दिलों में पहुँच ना पायें
मैं कविता लिखूंगा
तुझ पर ओ बच्ची
मगर पहले अपनी
उलझन ये सुलझा लूँ
कि तुझे देखकर
क्यों मैंने कलम ये उठाई?
पकड़ के तेरी कलाई
तुझे राह उजाले कि आख़िर
क्यों ना दिखाई?
शायद इसलिए
कि तेरी तरह ही मैं भी
फरेबों ,साजिशों के
अंधेरों में खड़ा हूँ
और रोशनाई में कलम की
रोशनी को
ढूंढ रहा हूँ
गुरुवार, 3 दिसंबर 2009
शून्य
तुम्हारे और मेरे
बीच के शून्य को
भर देना चाहता हूँ मैं
कुछ कोमल संवादों
और मधुर एहसासों से
चलो ऐसा करें कि
शब्दों के सेतु बाँध दें
इस पार से उस पार तक
जिनसे गुजरकर पहुँच सकें
कुछ मीठे पल
मुझ से तुम तक
और
तुम से मुझ तक
बीच के शून्य को
भर देना चाहता हूँ मैं
कुछ कोमल संवादों
और मधुर एहसासों से
चलो ऐसा करें कि
शब्दों के सेतु बाँध दें
इस पार से उस पार तक
जिनसे गुजरकर पहुँच सकें
कुछ मीठे पल
मुझ से तुम तक
और
तुम से मुझ तक
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
